ब्लफ-मास्टर !
जी हाँ यही शब्द मेरे दिमाग में कौंधा जब मैंने सुना कि वाम-दल मनमोहन सिंह सरकार से समर्थन वापस ले रहे हैं. मुझे अब भी यही लगता है कि न सिर्फ ये सरकार बच जाएगी पर वाम-दलों को साथ लेकर परमाणु समझौता भी कर लेगी.
ऐसा क्यों? आगे पढिए.
पिछले चार सालों से वाम-दल सरकार को बाहर से समर्थन दे रहे थे यानी जो भी उपलब्धियाँ हैं उसमे वाम-दलों का कोई हाथ नहीं है. वहीँ दूसरी ओर वाम-दलों के गढ़ माने जाने वाले पश्चिम बंगाल और केरल में नंदीग्राम और सिंगुर जैसे मुद्दों ने लोगों के गुस्से को भड़का दिया और ममता बैनर्जी पहली बार ताकतवर प्रतिद्वंदी के रूप में उभरीं. कहने का मतलब - 'खाया-पिया कुछ नहीं, गिलास तोडा बारह आना'.
अब पिछले कुछ दिनों कि खबरें याद करें - मायावती और आडवाणी, अमरनाथ मुद्दा और इससे जुडी सांप्रदायिक हिंसा, आदि. अब उन बातों को याद करें जो समर्थन वापस लेते समय करात साहब ने कही थी - सरकार पूरे मसौदे को छुपाकर रखना चाहती है, उनके कारण सांप्रदायिक ताकतें और मज़बूत होंगी, आदि.
सवाल उठता है - वाम-दलों ने क्या खोया , क्या पाया? उसके साथ-साथ यू.पी.ए. गठबंधन ने क्या खोया, क्या पाया. अगर वाम-दल अपने रुख पर अडे रहते हैं तो उनके पास पाने के लिए तो कुछ नहीं, हाँ खोने के लिए सबकुछ है.
और इस स्थिति में मनमोहन सिंह जी सरकार बचा लेते हैं तो भी चुनाव में इसका फायदा होगा ये कहना कठिन है.
हाँ अगर कांग्रेस और यू.पी.ए. के अन्य नेता वाम-दलों को मनाने के लिए सारा मसौदा देश के सामने रख देते हैं और वाम-दलों द्वारा 'देशहित' में सुझाए गए बदलाव मान लिए जाते हैं तो एक तीर से कई शिकार हो जाएंगे. पहले तो भारत को विश्व में परमाणु-देश का दर्जा दिलाना, सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ एकजुटता दिखाना और अपने और एन.डी.ए. गठबंधन की मजबूती की जांच, आदि, सभी एक साथ हो जाएंगी.
तो मुझे लगता है कि सरकार बच जाएगी और करार भी हो जाएगा वाम-दलों के समर्थन के साथ.
अब देखना ये है कि ऊँट किस करवट बैठता है.
विस्तार में जानने के लिए मेरे अंग्रेजी ब्लॉग पर जाएं, धन्यवाद!
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