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पेट्रोल की बात मैंने पिछले लेख में की, इस बार बात उसके जलने के बाद बनने वाले धुएं की. अगर आपको याद हो कुछ सालों पहले पी.यू.सी.(पाल्यूशन अंडर कंट्रोल) चेक की मुहीम शुरू हुई थी. अन्य सरकारी मुहिमों की तरह यह भी मध्यम-वर्गीय परिवारों को चूना लगाकर कुम्भकरणी नींद सो गई. हो सकता है इतने सालों बाद भूख से व्याकुल होकर उसकी नींद खुल जाए,तो तैयार रहने में ही भलाई है.
इसको लागू करते समय कहा गया की सरकार पर्यावरण की रक्षा के किए कटिबद्ध है और सभी को इसमे अपना सहयोग देना चाहिऐ. प्रदूषण फैलाने वाली गाड़ियों पर जुर्माना किया जाएगा और उनके मालिकों को इसको कम करने का प्रबंध करना होगा. जिस हिसाब से सघन चेकिंग अभियान शुरू हुआ सर्टिफिकेट देने वाली दुकानों पर लम्बी-लम्बी लाइने लग गई इन दुकानों ने तो जबरजस्त चांदी काटी ही, जिनकी गाडियाँ टेस्ट पास न कर पाई उनसे 'टेस्ट पास करने की कीमत' भी खूब वसूली गई. कई जगहों पर तो पुलिसवाले इन दुकानों से मुश्किल से दस कदम दूरी पर चेकिंग कर रहे थे, कहने की ज़रूरत नही ये क्या चेक कर रहे थे.
तो जनाब ये तो हुई ज़मीनी सच्चाई अब बात करें दिमागी सच्चाई की यानी तर्कों की. सही रखरखाव की कमी की वजह से ही गाडियाँ प्रदूषण फैलाती हैं. अब एक मध्यम-वर्गीय परिवार को लीजिये जो अपनी गाढी कमाई लगाकर गाडी खरीदता है, क्या वो इसकी क़द्र नही करेगा आप ही सोचिए. उसके सामने एक सरकारी गाडी को लीजिये जिसका पैसा पचास जगहों से होकर आता है या फिर एक सेकेंड हेंड ट्रक जिसकी उम्र हो चुकी है या फिर एक मिनी बस जो राशन के मिटटी-तेल पर चलती है. आप ही सोचिए किस गाडी का रखरखाव सही तरीके से नही हो पाता होगा
जब शासन ने वाहनों की उम्र निर्धारित कर रखी है तो फिर ये कैसे सडको पर दौड़ते हैं या राशन का मिटटी-तेल गाड़ियों की टंकियों तक कैसे पहुँचता है यह कोई बताएगा . जब वाहन उद्योग हर हाल में अपने आपको उन्नत टेक्नोलाजी से लेस कर रहा है फिर सरकार लोगों की जेब क्यो काट रही है यह समझ के परे है. टाटा की नेनो को ही लीजिये, यूरो-४ मानको का पालन करेगी यह गाडी तो क्या इसका भी पी.यू.सी. चेक करेंगे सरकार. शायद कर भी लें, अंग्रेजों के ज़माने के नियमो का पालन जो करना है २१ वी सदी की मशीन लगाकर.
क्या कोई इनसे पूछेगा की सन् साठ में ज्यादा प्रदूषण होता था की अब. साहब कोएले के इंजन से इलेक्ट्रिक इंजन तक हमने बहुत लंबा सफर तय कर लिया है, उस समय के हिसाब से तो हम बहुत कम प्रदूषण फैला रहे है जबकि गाड़ियों की संख्या इतनी बढ़ गई है ।
सरकार के लिए सबसे अच्छा है जो उसका काम है वही करे और जनता की जेब और गला काटना बंद करे.
खैर आप मेरी तरह चिंतित ना हों क्योंकि नक्कारखाने में तूती की आवाज कोई नही सुनता, आप तो बस 'हर फिक्र को धुएं में उडाते चलो'।
इति.
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