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हेलमेट चेकिंग मुहीम फिर से शुरू हो, दैनिक भास्कर के एक सिटिजन रिपोर्टर



हेलमेट चेकिंग मुहीम फिर से शुरू हो यह मांग दैनिक भास्कर के एक सिटिजन रिपोर्टर की है. अब इससे बुरा और क्या हो सकता है कि जनता अपने पैरों पर खुद कुल्हाडी मार ले.

मूल लेख में मैंने कुछ अनुमानित आंकडे दिए थे जो (लगभग) सही निकले, मरने वालों कि सख्या 750 न होकर सिर्फ 250 हो गई, और एक्सीडेंट 4000 से 3500 और घायलों की सख्या 4000 से 1600 यानी एक्सीडेंट होने की और उसमे मरने की और भी कम सम्भावना.

आपके लिए फिर लिखता हूँ, हेलमेट लगाने से मौत का डर कम होगा, जिससे लोग तेज गति से गाडी चलाने लगेंगे और नियमों की अनदेखी ज्यादा करने लगेंगे, इससे दुर्घटनाओं की संख्या बढेगी ही साथ ही बढ़ जाएगी इनमे मरने वालों की संख्या. इसके साथ ही जो लोग कार एक्सीडेंट, ट्रक के नीचे आ जाने से या अन्य कारणों से मरते हैं उनका एक सम्मिलित आंकडा सरकार हमें देती है, ये आप कैसे कह सकते हो की हेलमेट लगाने से कोई बच जाता. जिसका समय आ गया उसको जाना ही है, और अगर बच गया पर उसके हाथ-पैर खराब हो गए तो जिंदगी भर सरकार तो आएगी नही देखभाल करने.

साल भर हेलमेट को लगाकर और उसको साथ लेकर हर जगह घूमना कितना मुश्किल होता है उसको ये ऐ.सी. गाड़ियों में बैठने वाले क्या जाने. और अगर हमारी इतनी ही चिंता है तो हेलमेट की विश्वसनीयता साबित करके दिखाओ, सिर्फ कह देने से बात साबित हो जाती है क्या.

ढाक के वही तीन पात रह जाते हैं, आप ही सोचें हेलमेट बचाएगा की मरवाएगा, मर्जी है आपकी आखिर 'नारियल' है आपका.

इति.

अस्वीकरण