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तीन अधूरे सच:

भाग एक: 'मर्जी है आपकी आखिर 'नारियल' है आपका', हेलमेट की अनिवार्यता कितनी सही कितनी गलत


तीन अधूरे सच:
यह लेख लिखते समय मैंने सोचा था की एक पेज से ज्यादा नही होगा पर जैसे-जैसे मैं लिखता गया वैसे ही बात से बात निकलती गयी और मुझे उसको तीन भागों में बांटना पड़ा. वो तीन भाग हैं:


१. 'मर्जी है आपकी आखिर 'नारियल' है आपका', जो इस हफ्ते प्रकाशित कर रहा हूँ.


२. 'फिल्म अभी बाकी है मेरे दोस्त', और


३. 'हर फिक्र को धुएँ में उडाते चलो', जो अगले हफ्ते प्रकाशित होंगे.



'मर्जी है आपकी आखिर 'नारियल' है आपका'

हेलमेट की अनिवार्यता कितनी सही कितनी गलत

हमारे देश की सबसे बड़ी विडम्बना यही है की हमारे नेताओं और नौकरशाहों को हमारे कन्धों के ऊपर दिमाग वाला सिर की जगह पानी वाला नारियल दिखाई देता है. और पिछले साल इस नारियल को सड़क पर बचाने के लिए हेलमेट कानून लाया गया. पर क्या हेलमेट हमको बचा सकता है, कहीं यह भी आखों में धूल झोंकने का नया तरीका तो नही आइये देखते हैं.

चाहे वो इमरजेंसी के समय का परिवार नियोजन कार्यक्रम हो या रेलों में छाछ और कुल्हड़ वाली चाय, सरकारी नीतियों में हमेशा से ही भावुकता ज्यादा और यथार्थ को दर्शाने वाले आंकडों की कमी रही है. अब इस हेलमेट पहनने को अनिवार्य करने वाले आदेश को ही लीजिये,क्या तर्क दिए गए इसको लागू करते समय:
१. यह जनता की भलाई के लिए है.
२. सड़क दुर्घटनाओं में मरने वाले ८० फीसदी लोग सिर में लगी गंभीर चोटों की वजा से मरते हैं.
३. भारत को विकसित देश बनाने के लिए जानें बचाना ज़रूरी है.
४. लोगों में जागरूकता की कमी है जिसको 'अवेअरनेस केम्पेन' के ज़रिये ही दूर किया जा सकता है, आदि-आदि.

ये तर्क हैं (?), चलिए इनको तर्कों से ही काटते हैं. सत्ता के गलियारों में एक जुमला आम है की सरकार जो भी काम जनहित में करती है, उससे जनता के अलावा अन्य सभी का हित हो जाता है (हालिया खबरों को याद करें). क्या वो जनता जिसने आपको चुनकर भेजा इतनी मूर्ख है की अपनी जान की परवाह भी नही कर सकती (शायद हाँ). आदमी तो आदमी जानवारों तक में मौत का डर सबसे बडा होता है, और अगर वह डर बना हुआ है, तो व्यक्ति सतर्क रहेगा, चाहे सड़क हो या सीढ़ी. 'सावधानी हटी दुर्घटना घटी' यह हमारा ही नारा है, सावधानी हटाने का साधन तो खुद ही मुहैया करा रहें हैं. (अगर आप सहमत न हों तो किसी दिन बिना ब्रेक की गाडी चलाकर देखें, मेरी १०० प्रतिशत की गारंटी आपका एक्सीडेंट नही होगा)

अब आयें आंकडों की ओर, ८० फीसदी लोग सिर की चोट से मरते है, तो २० फीसदी अन्य कारणों से मरते होंगे. पर यह ८० और २० फीसदी है कितने लोगों का, और आखिर भोपाल में गाडियाँ कितनी हैं, कहीं यह सिर्फ खराब किस्मत की वजह से तो नही मार गए, भई सरकार तो आपको जवाब देगी नही तो मेरे (अनुमानित) आंकडों से काम चलायें. भोपाल में (लगभग) २० लाख लोग रहते हैं और यहाँ लगभग ५ (पांच) लाख वाहन हैं (सभी प्रकार के), साल भर में यहाँ (लगभग) ४००० एक्सीडेंट होते हैं जिनमे इतने ही लोग घायल होते हैं और करीब ७५० लोग मारे जाते हैं.


तो ६०० लोग मरते हैं सिर की चोट से साल भर में, अब इन छह सौ लोगों में कितने पैदल चलने वाले हैं, साईकिल वाले हैं, दुपहिया वाहन चालक हैं या कोई और यह मुझे नही पता पर आप तो समझ गए होंगे. कितने लोग बसों, ट्रकों और डमपरों के नीचे आकर मरे होंगे यह भी बताने की जरुरत नही है, हेलमेट बेचारा क्या कर लेगा ऐसे में. साल भर में ३०० दिन ३ लाख गाडियाँ ही अगर चलें और (सिर्फ) ४००० एक्सीडेंट हों तो मेरे हिसाब से हम लोगों को गाडियाँ चलाना आता है. (इसके साथ-साथ हेलमेट ने झपटमारों की भी चांदी कर दी है).

चलिए नही भी आता, तो क्या आप हमें गाडी चलाने का आदर्श वातावरण दे रहे हैं. यह बताने की ज़रूरत नही है की लाइसेंस कैसे बनता है, दिन में शहर में भारी वाहन कैसे घूमते हैं या जो ये आदेश देते हैं वो खुद इनका पालन नही करते (और कई बार मारे या घायल भी हो जाते हैं). जितना समय पुलिस मध्यम-वर्गीय परिवारों को परेशान करने में लगाती है उतना अगर असली कानून तोड़ने वालों पर लगाती तो ये साल के ७५० भी नही मरते.

अंत में, आप सभी से निवेदन है की ये सवाल कृपा कर सरकार से पूछें और हो सके तो इस दो किलो के बदबूदार तरबूज़ से (मुझे और) अपने आप को बचाएं, क्योंकि आपका एक्सीडेंट होने सम्भावना पच्चीस हजार में एक है और मरने की सम्भावना डेढ़ लाख में एक है (अगर आप वाहन चलाते हैं, नही तो उससे भी कहीं कम) .

देखिये मैं हेलमेट का विरोध नही कर रहा हूँ, मैं समस्याओं को एकतरफा तरीके से सुलझाने का विरोध कर रहा हूँ क्योंकि सिर्फ हेलमेट आपको कभी नही बचा सकता, इससे तो अच्छा है आप पुराने ज़माने में सैनिकों द्वारा पहना जाने वाला कवच ही पहन ले क्योंकि कोई आपको पैदल चलने में भी उडा सकता है, मर्जी है आपकी, आखिर नारियल है आपका.

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