भई धूम-बूम क्रिकेट का इस साल का कार्यक्रम तो ख़त्म हुआ पर इससे जुड़ी यादें तो (अभिजीत सावंत की तरह ) हमारे साथ कई सालों तक रहने वाली हैं. वार्न और धोनी की कप्तानी, मार्श, मेक्कुल्लम और युसूफ पठान के छक्के, तनवीर की अजब-गजब गेंदबाजी के साथ-साथ भज्जी का थप्पड़, चिअर-लीडरों की स्कर्ट जैसे कई बातें हमारे दिमाग में गड़ चुकी हैं. अगर इनमे हास्य और व्यंग्य की थोडी चाशनी डाल दी जाय तो मज़ा दोगुना हो जाएगा. तो जनाब पेश है आई पी एल की झलकियाँ बाबु मोशाय के चचेरे भई बाबु मसखरे की जुबानी:
सबसे पहले बात हमारे प्यारे सच्चू-सचिन की, पता नही चोटें उनका पीछा कब छोडेंगी. हमने भैयाजी से पूछा इस बार क्या तुड़वा बैठे तो जवाब आया, 'ग्रोईन' की चोट है. अब हम ठहरे गंवार आदमी, अंग्रेज़ी ज्यादा आती नही, तो फ़िर पूछा, ये क्या होता है. भैयाजी गुस्से से लाल हो गए, बोले 'अश्लीलता जाएगी नही तुम्हारी' और एक राप्टा भी जड़ दिया. आगे कुछ पूछने और कहने की हमारी हिम्मत न हुई. हाँ दिल से एक आवाज आई, 'सबको तो बताता फिरता है की अंडे रोज़ खाने से हट्टे-कट्टे होते हैं पर ख़ुद खाता नही, अगर खा लेता तो 'ग्रोईन' क्या कहीं की भी चोट ठीक हो जाती. खैर।
अब आयें थप्पड़ की ओर, ना जाने भज्जी ने श्री को थप्पड़ क्यों मरा. भैयाजी का तो मानना है की दोनों साईमंड को लेकर लड़ गए (कि कौन छींटाकशी करेगा), मुझे लगता है कि दोनों ने जिंटा जी से बचने के लिए एक (महंगा) नाटक खेला या फ़िर फ़िल्म पाने कि कोई साजिश थी. पर नतीजा तो कुछ और ही निकला, भज्जी हो गए खेल से बाहर, श्री से युवराज ने बात करना बंद कर दी और जिंटा जी उनसे गुस्सा हो गई. सबसे बड़ा फ़ायदा तो जनता (खासतौर पर आस्ट्रेलिया कि जनता) का हो गया. श्री सलीके से क्रिकेट खेलने लगा, जैसा कर्मा फ़िल्म में डा. डेंग कहता है, इस थप्पड़ कि गूँज तुम्हे ज़िंदगी भर सुनाई देगी, वैसे ही जितनी बार श्री मुह खोलने कि कोशिश करेगा उतनी बार उसे भज्जी का थप्पड़ याद आएगा. भगवान् कि कृपा ही है कि साइमंड ने थप्पड़ नही मार दिया. सुधर जाओ श्री-अशांत।
भई मैच के बीच में इतने एड आए, तो थोडी उनकी भी बात कर लेते हैं. न्यू यार्क वालों के एड में एक महिला अपने पति को ढूंढते हुए बालकनी में पहुचती है जहाँ उसका पति चैन से गाने सुन रहा है, उसी समय पीछे से आवाज़ आती है, 'मुसीबतें बता कर नही आती!', कितनी सही बात है (पति के नज़रिये से)।
ब्रेक के बाद आपका स्वागत है, चिअर-लीडर आपके लौटने कि खुशी में नाच रही हैं. पर इससे हमारे नेता खुश नही हैं, जिसके लिए वो अमेरिका के चक्कर लगाते थे, उसको इन 'कार्पोरेट-बिसनेस' वालों ने जनता को दे दिया, वो भी बिना पैसे के, इनसे बड़ा कम्युनिस्ट तो कोई हो ही नही सकता. चिअर-लीडरों से खिलाड़ी भी खुश नही. अब हमारे १९ साल के बच्चे आफरीदी को ही ले लीजिये. वो कहते हैं इनके कारण उनका ध्यान भटकता है (बाली उम्र का असर) पर असल दिक्कत तो उनके कप्तान को हुई. आफरीदी को बाउंड्री पर जैसे ही खड़ा करते वो पीछे मुड़कर 'डांस' देखने लगते और बाल निकल जाती बाउंड्री पार. खैर मुद्दा जैसे-तैसे सुलझ ही और आफरीदी की टीम हो गयी टूर्नामेंट से बाहर।
वक्त एक ब्रेक का और अब आए हैं 'फोन वाले', ये विज्ञापन नही देते बल्कि सामाजिक संदेश देते हैं. अब आप ही बताइये बच्चों को नौकरों के साथ नही कुत्ते (या अन्य पालतू) जानवरों के साथ छोड़ना चाहिए ये किसने बताया, 'फोन वालों' ने ना. वैसे यह सिर्फ़ संयोग था कि नही इसकी जांच भी हमारे न्यूज़-वालों को करना चाहिए, सी.बी.आई वालों के साथ मिलकर। हालिया एड तो हद पार करता है, एक लड़की के पेन कि इंक ख़त्म हो जाती है और एक 'मददगार' सहपाठी अपने पेन कि इंक दे देता है, आवाज आती है,'कभी-कभी छोटी छोटी बातें भी बहुत काम आती है', १० रु. का क्रेडिट कम्पनी देगी जिसमे से (नीचे छोटे अक्षरों में लिखा रहता है) १ रु. सर्विस चार्ज है और १० रु. अगले रिचार्ज में वसूला जाएगा. अब यह भी बताते जाएं महोदय, कि लड़की ने इंक किस हिसाब से इंक वापिस करी. सुनने में आया है कि 'फोन वालों' के सी.ई.ओ सरीन साहब इस्तीफा दे रहे हैं , मैं कहता हूँ अपना एड-विभाग के हेड को बदल दें काम हो जाएगा।
और इस एड के साथ इस वर्ष का आई पी एल विशेष लेख समाप्त होता है. आपसे जल्द ही (अगले वर्ष) मुलाकात होगी एक ज्यादा मजबूत, ज्यादा बेहतर और ज्यादा तेज आई पी एल टी-२० की गप्पों के साथ. (कई बातें जैसे शाहरुख़ और सलमान, गांगुली दादा और शेन वॉर्न, मोहाली एस.एस.पी. और नेस वाडिया, आदि छूट गयी हैं जिनकी बात फ़िर कभी करेंगे)
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