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क्या हम भोपाल को भूलते जा रहे हैं.




सन् १९३० में हुए दांडी मार्च को २००८ मे भी याद किया जाता है पर अप्रैल २००८ में हुई एक पदयात्रा जो किसी भी सूरत में दांडी से कम नही है, पर कोई ध्यान नही देता। हो सकता है की हमने इसपर इसलिए ध्यान न दिया हो क्योंकि इसमे गांधी जैसा कोई नेता नही था, या फिर हमारे लिए यह एक बहुत ही छोटा मुद्दा था, या फिर हमने भविष्य और वर्त्तमान को भुलाकर अतीत से चिपके रहने की और उसको महिमामंडित करने की आदत से एक बार फिर मजबूर हुए। जो भी हमने किया नतीजा तो वही रहेगा: भोपाल गैस त्रासदी और गैस-पीडितों के दर्द को हम धीरे-धीरे भूलते (भुलाते) जा रहे हैं। कितनी शर्म की बात है हमारे लिए।


मेरा ऐसा कहने के पीछे एक कारण है, चाहें तो आप भी आजमा लें। अगली बार आपको कोई भोपाली मिले तो उससे पूछें, 'भाई, भोपाल किसके लिए जाना जाता है' या 'भोपाल की सबसे खास बात क्या है', सौ में से निन्यानवे बार आपको यह सुनाई देगा, 'तालों और तालाबों के लिए', जो की (अबतक आप भी जान गए होंगे) सरासर गलत है। भोपाल को दुनिया में गैस त्रासदी के लिए जाना जाता है न की तालाबों के लिए। इसी दिशा में और आगे बढ़ें और पूछें 'यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री' का पता, जो की (भोपाल के युवाओं को तो खास तौर पर) अधिकतर लोगों को नही पता है। अब आप इन लोगों द्वारा फैक्ट्री को अपनी आखों से देखने के बारे में तो सोच ही सकते हैं। जिस शहर में ऐसी त्रासदी हो और वहां के लोग उसके बारे में ना जानते हों, तो जिन लोगों ने त्रासदी को झेला उनको तो एक असंभव युद्ध ही लड़ना है।


चर्चा का विषय यह नही है की लोग मुद्दों के प्रति उदासीन होते जा रहे हैं पर यह है की ऐसा क्यों हो रहा है. यह कह देना की भोपाल-वासी दोगले हैं या फ़िर उनकी कथनी और करनी में अन्तर है, बहुत आसान है। पर सच्चाई थोडी अलग और थोडी जटिल है। मुझे लगता है की जिस प्रकार हम एतिहासिक दिनों को छुट्टियों की तरह बिताने लगे हैं समस्या वहीं से शुरू होती है। उसपर हमारी भागदौड़ भरी जिंदगी, आदमी अपने परिवार के लिए समय निकाल ले वही बहुत है, किसी और के लिए जगह ही कहाँ बचती है। रही सही कसर हमारे नेतागण और मीडिया पूरी कर देते हैं। उनके सौजन्य से गैस-पीडितों का धरना या रैली हमे समय की बर्बादी या दिखावा दिखायी देने लगता है। अपने इतिहास को भुलाने में स्कूलों और कालेजों का भी बहुत बड़ा हाथ है, पर युवाओं को जिंदगी की सच्चाइयों से दूर, सबसे ज्यादा उनके माता-पिता ही करते हैं (अनजाने में या प्यार में)। बात सिर्फ़ गैस-पीडितों की नही है, यह समस्याओं के प्रति हमारे समाज के रवैये को दर्शाती है। क्या कहीं और ऐसा हो सकता है, आप ही सोचिये।


बात आकर ख़त्म होती है हमारी शासन प्रणाली पर। लोकतांत्रिक प्रणाली में रहने का फायदा भी वही है और नुकसान भी, लोक मत। अगर लोग जागरूक हों और एकजुट हों तो सरकार को उनकी बात माननी ही पड़ेगी। (अच्छे के लिए या बुरे के लिए) यह हम कई मामलों में देख चुके हैं जैसे की जेसिका लाल, मंजुनाथ शंमुग्हम, प्रोफेसर सभरवाल, उपहार सिनेमा आदि। अब समय आ गया है की भोपाल के लोग भी गैस-पीडितों के अधिकारों के लिए उठ खड़े हो, हम सभी गाँधी नही बन सकते पर मानवीय मूल्यों का तो पालन कर ही सकते हैं। सबसे बड़ी बात तो यह है की हम अपनी दिनचर्या से कुछ समय निकलकर अपने आसपास होने वाली चीजों को देखें और बच्चों को मशीन बनाने की रेस से (थोड़ा) दूर करें और दुनिया देखने का मौका दें। नही तो धीरे-धीरे हम सिर्फ़ अपने आपको ही याद रख पाएंगे, जिससे हम एक ही समय में सर्व-शक्तिमान और असहाय होंगे। बाकी कल्पना तो आप ख़ुद भी कर सकते हैं.
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